तुम कहती हो —
WhatsApp है मगर में देखती नहीं
अक्सर कह देती हो—
“मैं तो WhatsApp देखती ही नहीं,”
कि जैसे कोई ताज पहन लिया हो तुमने बेगानेपन का।
क्या यह अदा, तुम्हारी है या फिर मुझसे दूरी बनाना,
या फिर बेरुखी का अपनी झंडा लहराना?
नज़रअंदाज़ करने का ये एक बहाना है,
ज़माने में जैसे अब दस्तूर बन गया है।
मेरा मैसेज ताकता रहता है तुम्हे
नीले टिक की मेहरबानी का इंतज़ार करता,
और दिल सोचता है — जवाब क्यों नहीं आता?
WhatsApp तो बहाना है, असली बात तो यही है,
आस्तीन के नीचे छुपे नाग एक दिन दिख जाते हैं।
कितना आसान है तुम्हारा यह कह देना —
WhatsApp है मगर में देखती नहीं
अक्सर कह देती हो—
“मैं तो WhatsApp देखती ही नहीं,”