घनघोर बरसो (Ghanghor Barso)

सावन के महीने में छत पर बूदें बरस रहीं थी
ऐसे बरसा सावन जैसे कृपा बरस रही थी
भोर की थी छटा रात की कालिख घट रही थी
मैं बारिश में नहायी जैसे कृपा बरस रही थी

कहीं बूदों की टिप टिप कहीं पानी की कल कल
कहीं कड़कती बिजली नभ में बादल की हलचल
आपधापी अफरातफरी घनघोर बरस रही थी
मैं बारिश में नहायी जैसे कृपा बरस रही थी

बरखा ने मन बहलाया बचपन फिर से लौट आया
यौवन में था बिछड़ गया कोई साथी याद आया
पानी की शीतलता मन को भी तर कर रही थी
मैं बारिश में नहायी जैसे कृपा बरस रही थी

वह अहसास अलग ही था भुला मुझको जग ही था
मन में भय न चिंता एकाग्र चित्त प्रसन्न ही था
मन हो गया था निर्मल बाबा की धूनी सी रम रही थी
मैं बारिश में नहायी जैसे कृपा बरस रही थी

सावन के महीने में छत पर बूदें बरस रहीं थी
ऐसे बरसा सावन जैसे कृपा बरस रही थी
भोर की थी छटा रात की कालिख घट रही थी
मैं बारिश में नहायी जैसे कृपा बरस रही थी

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