कुछ तो खुदा की मर्ज़ी रही होगी
कुछ तक़दीर बेवफा रही होगी
कुछ कायनात की तिश्नगी होगी
इंसां इंसां में वर्ना इतना फर्क नहीं होता
ज़माना मतलबी औ खुदगर्ज़ नहीं होताआँखों की शर्मोहया मर जाती होगी
दिल की ज़मीं पत्थर बन जाती होगी
मोहब्बत आज तिज़ारत बन गयी हैं
कभी ज़ज़्बातों से खेली जाती होगीकुछ तो खुदा की मर्ज़ी रही होगी
कुछ तक़दीर बेवफा रही होगी
कुछ कायनात की तिश्नगी होगी
इंसां इंसां में वर्ना इतना फर्क नहीं होता
ज़माना मतलबी औ खुदगर्ज़ नहीं होताहैसियत तय करती वज़ूद इंसान का
हुनर दम तोड़ता है दौलत के सामने
सपनों की ख़ाक में इल्म भटकता है
घुटने टेक देता है ज़हालत के आगेकुछ तो खुदा की मर्ज़ी रही होगी
कुछ तक़दीर बेवफा रही होगी
कुछ कायनात की तिश्नगी होगी
इंसां इंसां में वर्ना इतना फर्क नहीं होता
ज़माना मतलबी औ खुदगर्ज़ नहीं होता