बचपन में जब कभी चोट लगती
मां कहती थी कि रोया नहीं करते
कोई खिलौना या तोहफा कोई देकर
बहला देती कि दिल छोटा नहीं करतेदिल में चुभी आज फांस बहुत है
सुलगी सीने में फिर आग बहुत है
इस दिल को कोई फिर समझा दो न
मुझको ज़रा सा रुला दो नआँखें गीली हैं पर रोती नहीं हैं
नींद भी साथ अब देती नहीं है
पुर्जा पुर्जा सर दुखता है मेरा
कोई मुझको दवा दो न
मुझको ज़रा सा रुला दो नरोना है चैन से सोना है मुझको
बचपन में फिर से लौटना है मुझको
धीरे धीरे गाल पर थपकियाँ देकर
लोरी कोई मुझको सुना दो न
मुझको ज़रा सा रुला दो न