मुझको रोना किसने सिखाया
प्रकृति न रोती ना चाँद सितारे
पेड़ न रोते ना जिनावर
जितने भी घायल हो जाते
फिर मुझको भगवन क्यूं तुमने
रोने वाला जीव बनाया
क्या इतना आवश्यक था
कि पैदा होते ही रुलायातुम स्वंय सदा प्रफुल्लित रहते
चिंता छोडो तुम हो कहते
भान तुम्हें था कि यह जग
है असीम दुःख का सागर
बीच भंवर में फंसा रहूँगा
क्षणिक हंसी की पतवार पकड़
दुःख के थपेड़े सहता रहूँगा
हाथ जोड़कर विनय करूँगा
नैया पार लगाओ गिरिधर
यहां कैसा प्रपंच रचाया
मुझको रोना किसने सिखायाश्रेष्ठ योनि मानव की कहकर
दिए शब्द गुणगान रहे
अंधे कुएं में चीख-चीख कर
हम तुमसे त्राहिमाम कहें
शब्द मेरे ले लो मुझसे
शब्दों ने ही है उलझाया
शब्द बने सब दुख का कारण
शब्दों ने है मुझे रुलायाशब्द नहीं प्रकृति खुश है
खुश हैं सूरज चाँद सितारे
निशब्द सुखी सब पेड़ जिनावर
शब्दों ने कोहराम मचाया
शब्द कर रहे तांडव प्रभु
शब्दों ने ही है उलझाया
शब्द बने सब दुख का कारण
शब्दों ने है मुझे रुलाया