हरा-आम-जादा (Hara-Aam-Zada)

मिटटी में दबी गुठली में से
आम का एक नन्हा पौधा
देख रहा था मुझे टुकुर टुकुर
अलग से एक वीरान में
मैंने कहा भाई तुम तो आम हो
यानी फलों के राजा
फिर कैसे रहते हो तनहा
इस खामोश से सुनसान में

बड़ी मासूमियत से वह बोला
मैं ख़ास था ही कब
मेरी माँ भी आम थी मैं भी हूँ
और बड़ा होकर भी
आम ही कहलाऊँगा
जब फल लगेंगे तब भी
मीठा ही सही आम ही रहूँगा
और तू ज्यादा खुश मत हो
हम दोनों में ख़ास फर्क नहीं है
मैं आम हूँ तो तू आम आदमी है
किस्मत हम दोनों की एक सी है
हम दोनों ही कहीं एकांत में पैदा हुए
बड़े हुए भी तो बस अपने भाग्य से

मैं भी अगर बड़ा हुआ और फल लगे
तब सभी आएंगे दावा करने को और
हमें खाने, काटने, चूसने,कुचलने मसलने
और यहाँ तक की man-go शेक बनाने
जब तक मिठास है तब तक खाते हैं
फिर गुठली चूसकर फेंक देते हैं

पौधा आगे बोला  सुन आदमी
तुम्हें बचपन से सिखाया जाता है न
‘आम खाओ और पेड़ मत गिनो’
तूने वो कहावत भी सुनी  होगी
‘आम के आम गुठलियों के दाम ‘
पर आजकल गुठलियों की हालत
ज्यादा खराब है क्योंकि लोग अब
उनकी परवाह नहीं करते हैं और
इस्तेमाल के बाद फेंक देते हैं
सड़क पर नाली में या और कहीं
आखिर कोइयेः क्यों नहीं सिखाता
कि गुठली मत फैंको
वह जन्मदायिनी है माँ है

मैं भी ऐसी ही किसी इंसान के द्वारा
इस्तेमाल के बाद फेंकी गयी
गुठली से पैदा हुआ हूँ
मेरी माँ भी एक आम थी
जिसकी मिठास लूटकर
छोड़ दिया  इस वीराने में मगर
एक आवाज़ न उठी ज़माने में

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