गुड़िया

कुछ बात नहीं थी कहने की
सबसे बातें रोज़ ही होती थीं
ख़ास नहीं था आज भी कुछ
वह बेचारी भला क्या कहती

सबके ताने व उनके मायने
सब याद आज भी थे उसको
इतना कुछ जब सुन रखा था
और भला क्या अब सुनती

सबसे मिलना चाहती थी बस
बेटियाँ सदा न संग रहतीं
सब छोड़ कल चली जायेगी
अब से मिलने ही आ पाएगी
गुड़िया पराई अब हो जायेगी

सब कुछ बदलने वाला था
मन कुछ दिन से भारी था
अपनों का भी था यही हाल
भावों में कोलाहल जारी था

गीली आँखों को अपनी माँ
पल्लू से थी पोंछती बार बार
आँखों में बसाती लाडो को
एक बार और आखिरी बार

सब तैयारी कर दी है तेरी
अच्छे से सब समझ लेना
संस्कार मिले हैं जो घर से
उन बातों पर ही तू चलना

शांत स्वभाव के थे पापा
बैठे सोफे थे में धंसे हुए
शून्य में निहारते जाते
सीने में समंदर भरे हुए

मुस्कुराये कुछ देर तलक
जिह्वा को कुछ विराम दिया
हाथ फेर सर पर बेटी के
बाँध सब्र का थाम लिया

                 

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