याद है तुमको छत पे तुम्हारी
मैंने एक कागज़ फेंका था
तुम अपनी छत पर बैठी थी
मैं मुंडेर पर लेटा थादोपहरी का वक्त था शायद
घरवाले सब सो गए थे
डैड तुम्हारे बैग उठाकर
ऑफिस को चले गए थेहम एक दूजे को देखने
अक्सर छत पर आ जाते थे
आँखों में ही दोनों इश्क़ का
भूगोल इतिहास पढ़ जाते थेक्या कहें उम्र ही ऐसी थी
हर शै अच्छी लगती थी
पहले प्यार की जब क्लास
हम दोनों की लगती थीमेरे कागज़ के खत को देख
तुम कितना घबरा गयी थी
झट उठाकर मेरे ख़त को
शरमाई नीचे आ गयी थीख़त जिसमें मैंने आखिर में
आई लव यू लिखा था
कागज़ का वो टुकड़ा नहीं
मेरा इज़हारे दिल था