गाँव की बेटी (Gaanv Ki Beti)

बिन कुछ जाने बिन बोले
वो बस हाँ कर देती है
मात पिता के वचनों पर
कोई सवाल नहीं करती
मन खराब नहीं करती

बचपन यौवन के आश्रय को
बिन सोचे तज चल देती है
फिर क्यों अबला कहते इसको
जो हिम्मत की पेटी है
गाँव में बसता जो भारत
वो भारत की बेटी है

सूटकेस में दो ठूँ कपड़े
आँखों में ले कजरारे सपने
तर बतर पसीने से मुंह ढक
सिन्दूर बहता हुआ माथे तक
नयी चूड़ियों की खनक

पति परमेश्वर की छाया बन
वो पल्लू थाम चल देती है
फिर क्यों अबला कहते इसको
जो हिम्मत की पेटी है
गाँव में बसता जो भारत
वो भारत की बेटी है

क्या जाने कि भाग्य का लेखा
उसे कहां ले जाएगा
शहर के छोटे कमरे में रख
कैद मजूरी करायेगा
सांस उखड़ती होगी एक दिन
स्वास्थय बिगड़ता जाएगा
धीरे-धीरे शहर का दानव
दोनों को खा जाएगा

फिक्र की हर बूंद को वह
पोंछ पल्लू में रख लेती है
फिर क्यों अबला कहते इसको
जो हिम्मत की पेटी है
गाँव में बसता जो भारत
वो भारत की बेटी है

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