लड़कपन में किस दौर से गुज़र जाते हैं
कितने नादां थे हम ये अब जान पाते हैं
हर खूबसूरत चेहरे पे दिल का आ जाना
नाकाम मोहब्बत में हंसना रोना रुलानादग़ाबाज़ महबूब के जलवे अब हंसाते हैं
कितनी मासूम थी ये अब सिर्फ बातें हैं
मोटी बेडोल बच्चों को ले जब चलती है I
ये बोझ अपने सर नहीं बस खैर मनाते हैं