बूढ़ा (Boodha)

घर के आँगन में आ बैठे थे जो पंछी हवा हुए
थका हुआ मानुष बैठा हैं दृष्टि शून्य में धरे हुए
सूनी आँखें कमज़ोर नज़र पगड़ी है सर पर धरे हुए
जंग जीवन की हारा योद्धा रणभूमि में डटे हुए

जिनके दाने की खातिर वह अपना खाना भूल गया
उनकी सुरक्षा करने को वह कई खतरों से खेल गया
जिनको दुनिया समझा था खुद अपना जहाँ बसाने को
पंख निकलते ही उड़ गए सब रुख अपने अपने घर को
कह सका न कुछ मूक रहा आंसू आँखों के पिए हुए
खुद से ही दोहराता रहता है जो भी थे हालात हुए

सदा नहीं था वह ऐसा उसका भी सुनहरा एक कल था
बल शाली हिम्मत वाला जीवन उसका भी उज्जवल था
किस्मत को ठेंगा दिखला मेहनत से बाग लगाया था
अपनों की खुशियों की खातिर अपना सर्वस्व लुटाया था
पर बिछड़ा जब जीवन साथी उसके हौसले पस्त हुए
हिम्मत छूटी खड्ग गिरा कर तलवार से रिक्त हुए

चेहरे की दरारों में बसती कई अनुभव की कहानी हैं
घर में बूढ़ों का ध्यान रखो वे अनुभव की निशानी हैं
धन दौलत की इन्हें आस नहीं बस बोल प्यार के दो बोलो
उनकी बातों के मलहम से जख्म सभी मन के धो लो
घने वृक्ष सी छाँव मिलेगी उनके सानिध्य में रहते हुए
राह अधिक आसां होगी उनके अनुभव से चलते हुए

मंदिर में और पूजा में हम कितना वक्त बिताते हैं
चंद बुजुर्ग घर के कोने में कहीं कारागार बिताते है

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