मजदूरी की मजबूरी (Majdoori Ki Majboori)

मैले कुचले से कपड़ों में
स्वेदग्रस्त हो यह प्राणी
जीवन है संघर्ष सिखाता
रिक्शेवाला सीख पुरानी

रुपये चंद कमाने को
घर बार छोड़ कर आया है
परिवार पालने की खातिर
परिवार त्यागकर आया है

मन बोझिल पर आँखों में
उम्मीद हिलोरें लेती है
अगली सवारी तेरी है
दिल को दिलासे देती है

सोया हो तो ‘चलना है’ ?
आवाज़ लगा कर तो देखो
वह तुरंत ही चल देगा
तत्परता उससे सीखो

गीत बुदबुदाता है कोई
करता खुद से है बात कभी
भाव छलक जाते हैं मन के
छेड़ो गर कोई तार कभी

बाबूजी क्या बतलाएं
अपनी तो है मजबूरी
बेटवा को खूब पढ़ाएंगे
नहीं करवाएंगे बेगारी

घरवाली बीमार पता नहीं
बुरी खबर कब आ जाए
उसकी इच्छा इतनी बस
बिटिया ससुराल पहुँच जाये

स्वप्न अधूरे समय रोज़
हाथों से फिसला जाता
दिन से रात रात से दिन
एक दिन खुद को बूढ़ा पाता

बीमारी और लाचारी
जीवन ज्योत बुझा जाती
बची मुफलिसी रिक्शा
अगली पीढ़ी हाथ थमा जाती

मैले कुचले से कपडों में
स्वेदग्रस्त फिर इक प्राणी
मज़दूरी की मजबूरी की
चलती रहती अनंत कहानी

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