ये जो तेरी ज़ुल्फ़ बारहा पेशानी पर आ गिरती है
मालूम होता है गिलहरी कोई दाना तलाशती है

मिल जाती हैं जो नज़रें तो झुक जाती हैं ये नज़रें
बचते ही नज़र हम पर क्यों टिक जाती हैं नज़रें

बातों में तेरी शहद है और हसी बाकमाल
पल्लू जो सर पर ओढ़ लो हो जाओ बेमिसाल

नीले अम्बर सी तेरी आँखें सादगी की तू मूरत है
शायद तुझे नहीं पता तू कितनी खूबसूरत है

आती हो अकेले जाती हो अकेले वीरां हो या मेले
कोई हमसफ़र बना लो वर्ना मर जाओगी अकेले

तेरी बेपरवाही पर दिल पहले ही था कुर्बान
सर रख दिया है कांधे पे क्या ले ही लोगी जान

यार कहूं हमसफ़र कहूं या जान पुकारूँ तुम्हें
दीवाना बना कर रख दिया है क्या कहूं तुम्हें

कमसिन हो मगर हर बात समझती हो
क्यों नहीं मेरे दिल के हालत समझती हो

दगाबाज़ निकले जो दोस्ती का दम भरते थे
अब रोता है दिल क्यूँ उन पर मरा करते थे

ज़िन्दगी में ठोकरें खा कर भी वो चलती रही
घर को भी संभाला उसने खुद भी संभलती रही

सर-ए-महफ़िल जब भी तूने अपना बुलाया है
नाज़ इस दिल पे गुरुर किस्मत पे आया है

बातों बातों में कहते कहते जो बात दबा जाती हो
दिल की ज़मीं पर कितने तूफ़ान उठा जाती हो

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