घबरा कर गर्मी में गुम हुई थी जो
अपने कुटुंब से बिछड़ गयी जो
घर लौटने को नदी माँ से मिलने को
सावन की राह तकते थक गयी थी जो
बारिश की बूंदों को खुद में समेटे
लहरा कर बारिश का पानी चला
अठखेलियां करती बारिश की बूंदों का
माँ से मिलने को रेला चला
इठला कर आपस में बतियाँ बनाती हैं
दिल में ख़ुशी का ठिकाना नहीं
इस बार लौटीं जो कह देंगी बाबुल से
हमको सजन घर अब जाना नहीं