हक़ हमारा (Haq Hamaara)

यह ज़मीं भी न थी न था आसमान ये
न दरिया समंदर खूबसूरत जहाँ ये
न इंन्सां की हस्ती न जंगल जिनावर
बला खूबसूरत नज़ारे कहाँ ये

न था कुछ हमारा न था कुछ तुम्हारा
न हक़ था हमारा न हक़ था तुम्हारा

फिर उस खुदा ने जहाँ यह बसाया
कायनात सारी फिर इंसां रचाया
मगर इंसां से इंसां छोटा बड़ा क्यों
खुदा ने जब सबको बराबर बनाया

खुदा से मिला है हमें हक़ हमारा
अगर हक़ है तुमको तो है हक़ हमारा

तुम्हारी अमीरी हो तुमको मुबारक
बनो मत मगर तुम आका हमारे
जाओगे जब छोड़कर जहाँ ये
खुले होंगे तब हाथ दोनों तुम्हारे

दे दो न छीनो हमें हक़ हमारा
तुम्हें हक़ नहीं कि लो हक़ हमारा

इंसां हो तुम तो हैं बन्दे हम भी
खाते है रोटी और पीते गम भी
तुमको मिले तो है हक़ तुम्हारा
हम जो मांगे तो क्यों नुक्ताचीं

हमारा भी हक़ है नहीं सब तुम्हारा
तुम्हें हक़ है प्यारा तो हमको हमारा

बदलते समय की न रफ़्तार रोको
दे दो हमें जो भी है हक़ हमारा
जुड़े हैं अभी हाथ मगर जब उठेंगे
मिट जाये नाम-ओ-निशां न तुम्हारा

दे दो न छीनो हमें हक़ हमारा
लेकर रहेंगे सुनो हक़ हमारा

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