तन्हाई (Tanhaaee)
गए रोज़ खयालात मेरे चुपचाप थेज़िन्दगी के अजीब बड़े हालात थेगए रोज़ ख़यालात मेरे चुपचाप थे न होश हमें न […]
गए रोज़ खयालात मेरे चुपचाप थेज़िन्दगी के अजीब बड़े हालात थेगए रोज़ ख़यालात मेरे चुपचाप थे न होश हमें न […]
गोरी पियाजी के घर को चलीदुनिया किसी की बसाने चलीकितनों के अरमान ढीले हुएटुकड़े दिलों को बनाकर चली गोरी पियाजी
ज़ज़्बात की मेरे अजी बोली न लगाओबाजार में हर चीज़ बिकाऊ नहीं होतीछोड़ दो आदत कि हर शै की है
दिन दिवाली दीपक तुम्हाराघर किसी और का तो क्या बात हैथोड़ी मिठाई नए कुछ कपड़ेबालक गरीब का तो क्या बात है हज़ारों
तन्हाईयों के महल में रहते हैं वो याद बनकरकभी रहते थे दुआओं में जो फ़रियाद बनकर वो था मंज़र फुर्सतों
धरती के विशाल सीने में कहीं एक हलचल हुईबीज फूटा कुछ बिखरा और आवाज़ चटक हुई एक नन्हे से पौधे
A, B से जब कुछ कहता है,B दोहराता है C से।C, A जब बन जाता है,तो फैले बात तेजी से।
पेड़ मैं नीम का उग आया एक मकां के दरवाज़े परकिसी जोड़े ने मुझको सींचा दी छाँव मैंने भी घर
हज़ारों चेहरों के दरमियाँ… इंसाँइक सगा होता है। बनकर ख़ास… जो दिल की बस्ती मेंपनाह लेता है। कैसे… दिल-ए-ख़ामोशमहल सपनों
हंसकर यूँ ज़ज़्बात छुपाते क्यूँ होअंदाज़ की तल्खी को दबाते क्यूँ होखफा हो तुम जो तो कह दो हमसेयूँ नज़र
कोशिशें तमाम बेकार हुईंजेहन की पशोपेश मगर हार हुईख़्वाबों को बेइंतेहा दौड़ायाहुनर चुन चुन लफ्ज़ ले लायाकोई तक़रीर न उतरी
फलक से तारे लाना चाहता हूँ तुम्हें मंज़ूर हो तोचाँद पर घर बनाना चाहता हूँ अगर मंज़ूर हो तो तुम्हारे
ज़ुल्म का अत्याचारकरता जाता नरसंघाररोता विश्व ज़ार ज़ारसरकारें भी लाचारचहुँओर हाहाकारघोर चीख पुकारसर होता खून सवार सिस्टम लाचारव्यर्थ कानूनी तक़रारमातृ
मौत ने फिर चाल चली कोई गुज़र गयाएक और बेचारा हसरतों पे हो क़ुर्बां गया चाँद छूने के तो नहीं
छोटी खुशियों में ज़ज़्ब बड़ी बातें हैंअपनों से मिला करतीं ढेर सौगातें हैंखुशियों का टोकरा हम भर लाते हैंखुशियां बांटते
माफ़िक़ न सही हर रिश्ता निभाया है हमनेगैर ज़माना हुआ मगर साथ निभाया है हमने आसान राहों से लोग छुआ
भारत की बेटी ये है भारत की बेटीभाग्य देखो कैसे कैसे लाती है बेटी लाल बत्ती पर फटे मैले कपड़ों
किसने फेंका है ठहरे पानी में पत्थरहवा को बांधने की ज़ुर्रत की हैकौन उजाड़ रहा है घरोंदे चिड़ियों केपरिंदों को
बदहवास दौड़ती फिर रही है ज़िन्दगीधुआं धुआं गर्द सिमटती शहरवालों में आदमी ही आदमी मिलते हैं दुकानों मेंआदमी से आदमी
मंज़िल है दूर तन्हा सफर जीत होगी कलपेश आएगी मुश्किल ज़रा संभलकर चल माना कि फेर ली हैं सब अपनों