तेरी मोहब्बत के चंद फूल
रखे थे हमने किताबों में
खिल जाते जो फिर से
चले आते हो जब ख़्वाबों मेंआज तेरी उल्फत के गोया
मैं दाम लगा आया हूँ
कबाड़ी को वो किताब
दस रुपये में बेच आया हूँएक तस्वीर तेरी देखी थी
बंद अलमारी में
चंद खत जो तूने लिखे
इश्क़ की बीमारी मेंहर बीमारी की मैं अब
दवा कर आया हूँ
बंद अलमारी को मैं
आग दिखा आया हूँघर सुनाई देती थी
तेरी बेबाक खिलखिलाहट
चप्पा चप्पा सुनाता था
तेरे क़दमों की आहटतेरी याद जो दिलाये
वो हर शय भुला आया हूँ
मैं घर ही अपना सनम
कौड़ियों में बेच आया हूँ