ज़िंदगी को
मैंने कह दिया—
जा सिमरन जा,
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…
ज़िंदगी….
ज़िंदगी होमवर्क और किताब बन गई थी,
नौकरी की पढ़ाई का ख़िताब बन गई थी।
“अव्वल आओ!”—पापा का रुआब बन गई थी,
साँसों पर भारी एक हिसाब बन गई थी।
मैंने कह दिया—
जा सिमरन जा,
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…
ज़िंदगी….
ज़िंदगी आधे-अधूरे ख़्वाब बन गई थी,
मुश्किलों में बीड़ी-शराब बन गई थी।
गर्मी में लू देता आफ़ताब बन गई थी,
क्या कहूँ—खाना-ए-ख़राब बन गई थी।
मैंने कह दिया—
जा सिमरन जा,
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…
ज़िंदगी….
ज़िंदगी बेवफ़ाई का सबब बन गई थी,
चंद फ़रेबी दोस्तों का ढब बन गई थी।
बदनसीबी की बेगार बनकर रह गई थी,
थके दिल की दीवार बनकर रह गई थी।
मैंने कह दिया—
जा सिमरन जा,
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…
ज़िंदगी….
ज़िंदगी उजड़ा घर-संसार बन गई थी,
रोज़ की तकरार की मार बन गई थी।
हर लम्हा जैसे दुश्वार बन गई थी,
चलती साँसों की हार बन गई थी।
मैंने कह दिया—
जा सिमरन जा,
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…
मैंने उसे बेइंतहा चाहा—वो मिली नहीं,
मैंने उसे आवाज़ दी—पर वो रुकी नहीं।
जब ज़िंदगी मेरी, ज़िंदगी रही ही नहीं…
मैंने मुँह मोड़ लिया, नाता तोड़ लिया,
वो बदहवास पीछे आती रही…
चीखती चिल्लाती रही—
मगर….
मैंने कह दिया…
जा सिमरन जा…
जा जी ले अपनी ज़िंदगी…